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शुक्रवार, 26 नवंबर 2010

गोधरा से बड़ा है गोरखपुर

आप सोच रहे होंगे भला गोरखपुर और गोधरा में क्या समानता। समानता है और गजब की समानता है। एक जगह मोदी है, एक जगह योगी है। एक सांप्रदायिकता की प्रयोगशाला चलाता है, दूसरा सांप्रदायिक विचार पैदा करता है, उसे शरण देता है। पिछले दो-तीन दशकों में देश में सांप्रदायिक ताकतों को खाद-पानी देने में इन दोनों ही शहरों की खास भूमिका रही है। अब अगर सवाल करें की दोनों में नंबर वन कौन है, तो इसका जवाब ढूंढना मुश्किल नहीं होगा। गोधरा का उबाल तो महज कुछ दिनों का था, लेकिन गोरखपुर में दशकों से कुछ उबल रहा है-योगी और उनकी मंडली तो उस उबाल का एक निमित्त मात्र है। यहां मैं आपकों कुछ ऐसे तथ्यों से रूबरू कराने जा रहा हूं, जो कबीर, बुद्ध, फिराक, प्रेमचंद की कर्मभूमि का एक कड़वा सच सामने लाते हैं।


- विश्व में धार्मिक पुस्तकों का सबसे बड़ा प्रकाशक गीता प्रेस गोरखपुर शहर में है।

- संघ के कलुषित विचारों की बाल प्रयोगशाला सरस्वती शिशु विद्या मंदिर की शुरुआत गोरखपुर से हुई।

- हिंदुत्व के नाम पर लंपट युवाओं का गिरोह हिंदू युवा वाहिनी का गठन गोरखपुर में।

- 1998 से गोरखपुर संसदीय सीट लगातार हिंदुत्व के कब्जे में।


गोरखपुर में पिछले दो दशकों से जो हो रहा है, वह यहीं ठहरा नहीं है। दशकों से इस शहर में पलती आ रही सांप्रदायिक राजनीति अभी और गहराएगी। शहर का सोचने-विचारने वाला तबका इससे भली भांति वाकिफ है, लेकिन हिंदुत्व की इस हिंसक हुंकार के आगे विरोध में मुंह खोलने की हिम्मत किसी में नहीं। वह विश्वविद्यालय में मौजूद कथित वामपंथी हों, या दूसरे सामाजिक संगठन--सभी की एक जुबान है--गोरखपुर में रहना है, तो योगी योगी कहना है।

कुछ जरूरी लिंक-
http://www.yogiadityanath.in/va2.html

http://en.wikipedia.org/wiki/Adityanath_Yogi